AHSAAN & KHAT
ADABI SANGAM MEET BY SUBHASH ARORA on AUGUST 30,2026 at Mini Bar & Grill, 1527 Hillside Avenue, New Hyde Park.NY 11040
खत/चिट्ठियां बोलती नहीं , चुपके से पढ़ने वाले के दिल में उतर जाती हैं
बोलना जरूरी नहीं किसी के ज़ेहन में उतरने के लिए ,
हमें महज खुद एक खत होना पड़ता है , पढ़ने वाले खुद समझ जाते हैं
कौन करता है इंतज़ार आज कल डाकिये का
ख़ुशी और गम दोनों हो गए हैं डिजिटल ,
अब इन्हें मनाने के लिए कोई त्यौहार नहीं आता ,
क्योंकि अब लिफाफे में कोई खत कोई तार नहीं आता
जरूरी नहीं हर खत मंजिल तक पहुँच ही जाए , जिसपे पते तो होते हैं लेकिन टिकट नहीं होती
और बैरंग खतों को जेब से जुर्माना देकर कोई लेना नहीं चाहता
मेरे प्रिय साथियों, आज काफी समय बाद मैं अपना एक खत अपने चिरपरिचित अंदाज़ में लेकर आपके सामने उपस्थित हूँ , इसे पोस्ट नहीं किया, शायद आपको कभी वक्त पे मिल ही नहीं पाता टिकट जो नहीं लगा था इस पे , इसलिए खुद ही पढ़ के सुनाने चला आया हूँ , आशा है हमारे सुभाष जी इसे मेरी ईमानदारी से लिखा असली खत ही समझेन्गे
था वो भी एक जमाना "स्याही में डूबे कलम से लिखे लफ्ज़, कागज़ पे जब उतरते थे , वो महज़ अल्फ़ाज़ नहीं, हमारे जज़्बात हुआ करते थे ।" लोग पढ़ते थे ,रोते थे कभी जोर जोर से हँसते थे, चूमते थे खत में लिखे एक एक शब्द , कीमती मोती की तरह परखते थे
साथियों, खत बेशक केवल कागज़ का एक टुकड़ा होता था…लेकिन हम सब के लिए वो अलग-अलग मतलब और विशेष संदेश वाहक होता था
सालों बाद आज फिर हाथ में कलम उठाई है, खत लिखें भी तो किसको ? लेकिन जो बातें आज के वक्त में फोन की स्क्रीन पर फीकी रह जाती हैं, उन्हें इस कोरे कागज़ पर उतारने का मन हुआ। इस ख़त का हर एक लफ़्ज़ मेरी खामोश धड़कनों की आवाज़ है। आप सब के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं:
कागज़ पर बिखरे हैं जो लफ़्ज़ मेरे,
वो सिर्फ़ शब्द नहीं, जज़्बात हैं गहरे।
दूरी तो सिर्फ़ रास्तों की है दरमियाँ,
वरना हर साँस पर पहरे हैं तेरे।
वो सिर्फ़ शब्द नहीं, जज़्बात हैं गहरे।
दूरी तो सिर्फ़ रास्तों की है दरमियाँ,
वरना हर साँस पर पहरे हैं तेरे।
इस कागज़ को जब तुम छुओगे/, तो महसूस करना कि यह सिर्फ़ एक कागज़ नहीं, मेरा तुम्हारे पास भेजा हुआ एक एहसास है। जब वक़्त मिले, तो जवाब ज़रूर लिखना। पढ़ कर रद्दी की टोकरी में मत डाल देना ,तुम्हारे जवाबी ख़त का इंतज़ार रहेगा।
चंद पैसों में पोस्ट ऑफिस से मिल जाता था, पूरी दुनिया का चक्कर काट कर अपनी मंजिल पे पहुँचता था , बेचारा एक गरीब सा खत ,
चंद पैसों में पोस्ट ऑफिस से मिल जाता था, पूरी दुनिया का चक्कर काट कर अपनी मंजिल पे पहुँचता था , बेचारा एक गरीब सा खत ,
कभी-कभी दिनों में तो कभी-कभी महीनों में।
अपनी जवानी की शुरुआत में हमें भी एक शोक चढ़ा ,पूरी दुनिया को जानने के लिए , बहुत से पेन फ्रेंड बनाये मैंने , हर देश में हर पोस्ट ऑफिस को हमने काम पे लगा रखा था , इतना शोक था हमें खत लिखने का , हर खत का जवाब कम से कम बीस दिन में आता था , और रोज गेट पे खड़े होकर डाकिये की राह ताकने में ही पूरा दिन निकल जाता था , कभी भी डिप्रेशन का नाम भी नहीं सुना था. और जब जवाब आता था तो मानो सात समुंदर पार से कोई सामने आ खड़ा हुआ है। खत लिखने वाले की खुशबू उसमें महसूस होती थी.
लेकिन वह लिखने वाले के दिल का आइना होता था।पढ़ने वाले भी कमतर नहीं थे, बार बार उसी खत को पढ़ते थे शायद कुछ बात छूठ न गई हो ।जब हम खत लिखते थे , तो अपना समय, अपना धैर्य और अपनी रूह का एक हिस्सा उस कागज़ पर उतार देते थे। लिखते समय कभी-कभी हाथ भी कांपते थे, तो कभी खुशी या गम के आँसू उस खत के कुछ लब्ज़ मिटा देते थे। खत पढ़ने वाला केवल शब्द नहीं पढ़ता था, वह उन आंसुओं के निशान और उन कांपते हाथों की छुअन को महसूस कर लेता था और दो आंसू उसके भी निकल आते थे
प्रेम पत्र , शोक पत्र , निमंत्रण पत्र क्या क्या पत्र नहीं पढ़े हमने
इंतज़ार का वो मीठा दर्द: आज के 'इंस्टेंट इंटरनेट डिलीवरी' सोशल मीडिया के ज़माने में हमने वो 'इंतज़ार' का सुख ही नहीं खोया बल्कि अपना सकून भी खो दिया है। एक समय था जब डाकिए का इंतज़ार हमारी दिनचर्या का एक जरूरी हिस्सा होता था। खत भेजने के बाद जो जवाब की प्रतीक्षा होती थी, उसमें एक अलग ही कशिश थी। छत की मुंडेर पर अचानक आ बैठे कौवें की कावं कावं को खत या किसी सन्देश के आने का इशारा मान लेते थे
लेकिन वह लिखने वाले के दिल का आइना होता था।पढ़ने वाले भी कमतर नहीं थे, बार बार उसी खत को पढ़ते थे शायद कुछ बात छूठ न गई हो ।जब हम खत लिखते थे , तो अपना समय, अपना धैर्य और अपनी रूह का एक हिस्सा उस कागज़ पर उतार देते थे। लिखते समय कभी-कभी हाथ भी कांपते थे, तो कभी खुशी या गम के आँसू उस खत के कुछ लब्ज़ मिटा देते थे। खत पढ़ने वाला केवल शब्द नहीं पढ़ता था, वह उन आंसुओं के निशान और उन कांपते हाथों की छुअन को महसूस कर लेता था और दो आंसू उसके भी निकल आते थे
प्रेम पत्र , शोक पत्र , निमंत्रण पत्र क्या क्या पत्र नहीं पढ़े हमने
इंतज़ार का वो मीठा दर्द: आज के 'इंस्टेंट इंटरनेट डिलीवरी' सोशल मीडिया के ज़माने में हमने वो 'इंतज़ार' का सुख ही नहीं खोया बल्कि अपना सकून भी खो दिया है। एक समय था जब डाकिए का इंतज़ार हमारी दिनचर्या का एक जरूरी हिस्सा होता था। खत भेजने के बाद जो जवाब की प्रतीक्षा होती थी, उसमें एक अलग ही कशिश थी। छत की मुंडेर पर अचानक आ बैठे कौवें की कावं कावं को खत या किसी सन्देश के आने का इशारा मान लेते थे
कितना हसीं होता था मोहब्बत का भी वो पुराना जमाना , उनके लिखे हुए वो खत अपनी किसी डायरी में छुपाना
शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने इस इंतज़ार और खत की अहमियत को कुछ यूँ बयां किया है:
"क़ासिद ( डाकिया) के आते-आते, ख़त इक और लिख रखूँ,
मैं जानता हूँ ,जो वो लिखेंगे जवाब में।"
इतना लम्बा था इंतज़ार की जवाब भी खुद लिखने को दिल करता था
उस एक खत में किसी माँ के लिए सरहद पर खड़े बेटे की कुशलता होती थी, तो किसी का अंतिम संदेश
"क़ासिद ( डाकिया) के आते-आते, ख़त इक और लिख रखूँ,
मैं जानता हूँ ,जो वो लिखेंगे जवाब में।"
इतना लम्बा था इंतज़ार की जवाब भी खुद लिखने को दिल करता था
उस एक खत में किसी माँ के लिए सरहद पर खड़े बेटे की कुशलता होती थी, तो किसी का अंतिम संदेश
बरबस दिल ख़ुशी से उछल पड़ता, था " चिठ्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है " किसी पत्र में छुपा महबूब का अक्स होता था, तो किसी बहन के लिए भाई का प्यार। किसी में भैया दूज या रक्षाबंधन का पैगाम
यादों की अलमारी में बड़े संजोय थे मैंने भी अपने कुछ खुश खत ,और सूखे फूल: खतों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे सहेजे जाते थे। आज हम फोन की मेमोरी फुल होने पर व्हाट्सअप मैसेजेस डिलीट कर देते हैं, क्योंकि और नए संदेशे आने बंद हो जाते है ,लेकिन खतों को पुरानी किताबों के पन्नों के बीच, संदूकों में, रेशमी कपड़ों में सहेज कर रखते थे उनके लिए जगह कभी कम नहीं पड़ती थी । कभी-कभी यही किताबें और दो चाहने वालो को , सबकी नजरो से छुपा कर प्रेम पत्रों का आदान-प्रदान, हमारे खत भी बखूबी अपनी मंजिल पर पहुंचा देती थीं। कुछ महान लोग तो इन पुराने पत्रों की किताबें छपवा कर, उन्हें बेच पैसा भी कमा जाते थे.
यादों की अलमारी में बड़े संजोय थे मैंने भी अपने कुछ खुश खत ,और सूखे फूल: खतों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे सहेजे जाते थे। आज हम फोन की मेमोरी फुल होने पर व्हाट्सअप मैसेजेस डिलीट कर देते हैं, क्योंकि और नए संदेशे आने बंद हो जाते है ,लेकिन खतों को पुरानी किताबों के पन्नों के बीच, संदूकों में, रेशमी कपड़ों में सहेज कर रखते थे उनके लिए जगह कभी कम नहीं पड़ती थी । कभी-कभी यही किताबें और दो चाहने वालो को , सबकी नजरो से छुपा कर प्रेम पत्रों का आदान-प्रदान, हमारे खत भी बखूबी अपनी मंजिल पर पहुंचा देती थीं। कुछ महान लोग तो इन पुराने पत्रों की किताबें छपवा कर, उन्हें बेच पैसा भी कमा जाते थे.
खत जो लिखा मैंने इंसानियत के पते पर , डाकिया ही चल बसा , कभी जवाब ही नहीं आया
आज कल बड़े लेटर्स to एडिटर्स अखबारों में छपाये जाते हैं जिन्हे पूरी दुनिया पढ़ती है पर वो शायद नहीं पढता जिसके लिए लिखे जाते है
हैं कुछ "सूखे गुलाब और वो पुराने से कुछ खत, आज भी मेरी अलमारी को महकाया करते हैं।" जिनका कदरदान सिवाए मेरे कोई और नहीं, न फेकने को दिल करता है न जलाने का , सालों में जब कभी होली दिवाली में अलमारी की सफाई करता हूँ तो अपने उन पत्रों को वापिस एक बार फिर पढ़ कर वापिस उसी युग में पहुँच जाता हूँ , और सोचने लगता हूँ कितना भोला था मैं भी जो ऐसे खत लिख डालता था ?
जब सालों बाद वो पीले पड़ चुके खत अचानक किसी पुरानी किताब से गिरते हैं, तो वो अपने साथ उस पूरे बीते हुए दौर को फिर से ज़िंदा कर देते हैं। उनमें से गुज़रे हुए वक़्त की और उस गुजरे हुए इंसान की खुशबू आती है।जिसके साथ यह खतौ किताबत हुआ करती थी
आज हम व्हाट्सएप, फेसबुक और ईमेल के युग में जी रहे हैं। तकनीक ने दूरियों को तो खत्म कर दिया है, लेकिन उसी के साथ दिलों के फासले भी बढ़ा दिए हैं। स्क्रीन पर चमकते हुए नीले (Blue Tick) और काले अक्षर सन्देश पढ़े जाने की सूचना तो दे सकते हैं, लेकिन भावनाएं जताने की नहीं।
"अब तो पलक झपकते ही पैगाम पहुंच जाते हैं, मगर इंतज़ार की वो मीठी तड़प अब कहाँ मिलती है! मैसेज के दौर में लफ्ज़ तो मिल जाते हैं, पर खतों वाली वो रूहानी महक अब कहाँ मिलती है!"
दुनिया चाहे कितनी भी तेज़ रफ़्तार क्यों न हो जाए, अपने हाथों से कुछ लिखने का सुकून कभी पुराना नहीं हो सकता।लिए अदबी संगम मुझे वो कमी पूरी करने का पूरा अवसर दे रहा , मैं खत लिखता हूँ और खुद ही पढ़ कर सुंनाने चला आता हूँ , डाकिये का झंझट ही ख़तम अब तो शादी व जन्मदिन के निमंत्रण भी व्हाट्सऐप पर आने लगे हैं
मेरा दिल आज भी करता है किसी को एक खत लिखूँ, पर लिखूँ किसको? पढ़ने वाला ही कहाँ बचा है इस दुनिया में , पढ़ भी लेगा तो जवाब नहीं देगा अलबत्ता फ़ोन करके जतायेगा भाई कौन सी दुनिया में जी रहा है आज भी पत्र लिख रहा है ? मोबाइल नहीं है क्या ?
फिर भी इस सारी बेड़िओं को तोड़ते हुए मेरा यह मानना है के , कभी कभी हम अपने किसी बहुत करीबी दोस्त, रिश्ते को अपने हाथ से लिखा हुआ एक खत ज़रूर भेज के देखें । यकीन मानिए, जब वो उस कागज़ को छुएंगे, तो उन्हें उसमें आपकी धड़कन सुनाई देगी, वो उसे संभाल कर रखेगा किसी भी कारण से । जवाब भले ही न दें दिल से दाद जरूर देंगे।
"लौट आओ दोस्तों ,कि फिर से एक बार वो दौर जिएं हम,
जब सालों बाद वो पीले पड़ चुके खत अचानक किसी पुरानी किताब से गिरते हैं, तो वो अपने साथ उस पूरे बीते हुए दौर को फिर से ज़िंदा कर देते हैं। उनमें से गुज़रे हुए वक़्त की और उस गुजरे हुए इंसान की खुशबू आती है।जिसके साथ यह खतौ किताबत हुआ करती थी
आज हम व्हाट्सएप, फेसबुक और ईमेल के युग में जी रहे हैं। तकनीक ने दूरियों को तो खत्म कर दिया है, लेकिन उसी के साथ दिलों के फासले भी बढ़ा दिए हैं। स्क्रीन पर चमकते हुए नीले (Blue Tick) और काले अक्षर सन्देश पढ़े जाने की सूचना तो दे सकते हैं, लेकिन भावनाएं जताने की नहीं।
"अब तो पलक झपकते ही पैगाम पहुंच जाते हैं, मगर इंतज़ार की वो मीठी तड़प अब कहाँ मिलती है! मैसेज के दौर में लफ्ज़ तो मिल जाते हैं, पर खतों वाली वो रूहानी महक अब कहाँ मिलती है!"
दुनिया चाहे कितनी भी तेज़ रफ़्तार क्यों न हो जाए, अपने हाथों से कुछ लिखने का सुकून कभी पुराना नहीं हो सकता।लिए अदबी संगम मुझे वो कमी पूरी करने का पूरा अवसर दे रहा , मैं खत लिखता हूँ और खुद ही पढ़ कर सुंनाने चला आता हूँ , डाकिये का झंझट ही ख़तम अब तो शादी व जन्मदिन के निमंत्रण भी व्हाट्सऐप पर आने लगे हैं
मेरा दिल आज भी करता है किसी को एक खत लिखूँ, पर लिखूँ किसको? पढ़ने वाला ही कहाँ बचा है इस दुनिया में , पढ़ भी लेगा तो जवाब नहीं देगा अलबत्ता फ़ोन करके जतायेगा भाई कौन सी दुनिया में जी रहा है आज भी पत्र लिख रहा है ? मोबाइल नहीं है क्या ?
फिर भी इस सारी बेड़िओं को तोड़ते हुए मेरा यह मानना है के , कभी कभी हम अपने किसी बहुत करीबी दोस्त, रिश्ते को अपने हाथ से लिखा हुआ एक खत ज़रूर भेज के देखें । यकीन मानिए, जब वो उस कागज़ को छुएंगे, तो उन्हें उसमें आपकी धड़कन सुनाई देगी, वो उसे संभाल कर रखेगा किसी भी कारण से । जवाब भले ही न दें दिल से दाद जरूर देंगे।
"लौट आओ दोस्तों ,कि फिर से एक बार वो दौर जिएं हम,
तुम खत लिखो और हम बेसब्री से डाकिये का ----इंतज़ार करें।"
yaado se juda
ख़त (Khat) – पुरानी यादों के नाम
प्रिय,
आज अचानक अलमारी साफ़ करते हुए तुम्हारी दी हुई वो पुरानी डायरी हाथ लग गई, और बस यादों का एक पूरा कारवां आँखों के सामने तैर गया। वो पुराने दिन, वो हँसना-हंसाना, और वो छोटी-छोटी बातें—वक़्त भले ही आगे बढ़ गया है, पर वो लम्हे आज भी मेरे दिल के एक कोने में वैसे ही महफ़ूज़ हैं।
तभी इस कागज़ पर कुछ पंक्तियाँ खुद-ब-खुद उतर आईं:
वक़्त की धूल में खो गए वो ज़माने,
पर आज भी ज़िंदा हैं यादों के अफ़साने।
तुम दूर हो तो क्या हुआ ऐ दोस्त,
दिल की धड़कन आज भी लगती है तुम्हें बुलाने पर।
यह ख़त सिर्फ़ एक संदेश नहीं, हमारे बीते हुए उन हसीन दिनों की एक छोटी सी झलक है। सच कहूँ तो उन दिनों की बहुत याद आती है। जब भी तुम्हें वक़्त मिले, मुझे अपनी ख़ैरियत ज़रूर लिखना।
पुरानी यादों और ढेर सारे प्यार के साथ,
yaado se juda
ख़त (Khat) – पुरानी यादों के नाम
प्रिय,
आज अचानक अलमारी साफ़ करते हुए तुम्हारी दी हुई वो पुरानी डायरी हाथ लग गई, और बस यादों का एक पूरा कारवां आँखों के सामने तैर गया। वो पुराने दिन, वो हँसना-हंसाना, और वो छोटी-छोटी बातें—वक़्त भले ही आगे बढ़ गया है, पर वो लम्हे आज भी मेरे दिल के एक कोने में वैसे ही महफ़ूज़ हैं।
तभी इस कागज़ पर कुछ पंक्तियाँ खुद-ब-खुद उतर आईं:
वक़्त की धूल में खो गए वो ज़माने,
पर आज भी ज़िंदा हैं यादों के अफ़साने।
तुम दूर हो तो क्या हुआ ऐ दोस्त,
दिल की धड़कन आज भी लगती है तुम्हें बुलाने पर।
यह ख़त सिर्फ़ एक संदेश नहीं, हमारे बीते हुए उन हसीन दिनों की एक छोटी सी झलक है। सच कहूँ तो उन दिनों की बहुत याद आती है। जब भी तुम्हें वक़्त मिले, मुझे अपनी ख़ैरियत ज़रूर लिखना।
पुरानी यादों और ढेर सारे प्यार के साथ,