Sunday, June 27, 2021

ADABI_ SANGAM ---TOPIC-- REUNION -पुनर्मिलन-- Post Pandemic first real meeting


"LIFE BEGINS HERE AGAIN "
ADABI_ SANGAM ---TOPIC-- REUNION -पुनर्मिलन--suggested Book titles for my Book ,


अदबी गुफ्तुगू, अदबी आइना , अविसम्रानिये लम्हे अदबी महफ़िल के , अदबी संगम के पड़ाव ,

लिख रही है आजकल , जिस संजीदगी से
मजबूरियां हमारी ,कहानियां कैसी कैसी
जैसे के कर रही हो खुद ही रहनुमाई ,
एक अदृश्य मौत , खुद की जिंदगी की

चारों तरफ यह ऐलान जो ,हो के चुका था ,
चाहता है ज़िंदगी ?,तो घर से बाहर मत निकल,

नियम कायदे क़ानून मान ,रोक ले अपनी साँसों को
एक नफीस नकाब से , और खबरदार हो जा ,
जाना कहीं भी हो चले जाना भले ,
कितना भी नूर हो चेहरे पे, मगर जाना छुपाके

सुना है साँसों के जरिये जिंदगी नहीं ,मौत मिलने लगी है
फिर भी साँसों को सिलिन्डर में ,कैद करने की होड़ लगी है ,
नादान हैं कितने हम लोग ?कुदरत की जो नेमते थे जंगलात
उन्हें नष्ट कर के छोड़, अब वेंटिलेटर्स बनाने में लगे है

कैसा जिरह बख्तर पहन ,फैला कोरोना का कहर,
ला इलाज़ सा , न ही कोई उपाय न दवाई का असर
डर फैला था ,आठो पहर। ,खामोशियां थी हर ओर,
मौतों का तांडव ,चेहरे कहीं भी यहां दिखते नहीं थे ,
बाज़ारों में रौनक नहीं , न लोग घर से निकलते।
पुनर्मिलन की बात तो क्या करते ,जनाब
मिलना तक भी गवारा न था उन्हें ।

किसने घोला यह जहर हवा में ,बला का खौफ़ था जिसमे ,
रेलें नहीं मेले नहीं रिक्शे नहीं ठेले नहीं,
जीवन की रेलमपेल में , सभी पडे अकेले से
ऐसे तो पल हमने कभी , जीवन में झेले नहीं,

बस इतना ही इत्मीनान था ,अब हम घर में है पर अकेले नहीं ,
पहली बार अपने परिवार से , पुनर्मिलन का अवसर मिला ,
वक्त की कमी का रोना रोते रोते ,न जाने कितने अकेले ही गुजर गए
कुछ लोग अपने माँ बाप से भी , बहुत दिनों बाद पहली बार मिले

उन्हें समझने का वक्त भी खूब मिला , दूर होने लगे सिले ,
बच्चों के भी मिट गए गिले
बरसों में एक बार फिर से एक साथ बैठे ,
भूल के अपनें सभी शिकवे गिले ,
मसरूफियत का किसी के पास कोई बहाना न था ,
बहुत समय बाद हमको ,अब ड्राइंग रूम सजाना था ।

लेकिन कमी खल रही थी जोर से बस एक ही ,
काश मित्रों से मिलकर ,एक बार महफ़िल फिर सजा ले ,
कसक थी आलिंगन कर बतियाने की ,जाम से जाम टकराने की

जीवन की गति अवरुद्ध थी ,गतिरुद्ध था सारा जहाँ ।
कस्बे सभी, सूबे सभी ,डूब गए थे मिलने के , मंसूबे सभी
कैसी लहर यह बेरहम थी , जिसे न तमीज थी न कोई शर्म

हर एक जुदाई की दास्तां शुरू होती है,
किसी अप्रशित क़यामत के आने से ,
और वह क़यामत सब पर एक साथ टूटी

मगर यह भी तो हकीकत है ,हर वोह क़िस्सा भी ,
तमाम हो जाता है, अपनी उम्र गुजर जाने के बाद ,

मिल तो पहले भी रहे थे एक दूरदर्शन के अदाकारों की तरह ( सिर्फ ज़ूम पर )
छटपटाहट थी रूबरू मिलने की, वह ख्वाइश आज पूरी हुई

बस इतना ही तो समझना और समझाना था
मांगता है हर शख्स का इश्क़ भी तो एक लम्बा इंतज़ार ,
और लम्बी जिंदगी?
अम्मा यार इसे भी इश्क समझ लो ------
मिलकर आज खत्म हुई ,रुसवाई भी

मैंने जब यह लाइने लिखी और दोस्त को सुनाई
दोस्तों ने टोका , अरे कहाँ के कवि हो तुम ?
तुकबंदी ही किये जा रहे हो ? बिना कलम दवात
अपने लैपटॉप पे अपने अरमान परोस रहे हो क्या ?

तुम बातें तो पुनर्मिलन की कर रहे थे न ? उसका क्या हश्र होगा ?
पहले अपने खौफजदा दोस्तों से तो पूछ लो ,
उनका पुनर मिलन कैसा रहेगा ?
उनसे क्या पूछें ,मैं खुद ही उसी भंवर से बच कर गुजरा हूँ

दरिया तलाशना ,कहीं सहरा तलाशना,
ख़ुद के जैसी ही दुनिया तलाशना,
फिर खंडरों को फिर से महल बनाना , आसान नहीं
बड़ा मुश्किल होता है -------

देखे हुए ख़्वाब सा ,एक ख़्वाब हर बार देखना
फिर उस ख़्वाब में भी एक नया ख़्वाब तलाशना,
खवाबों की भीड़ में ,फक्त एक ख्वाब को पकड़ पाना , आसान नहीं
बड़ा मुश्किल होता है ---------

तस्वीर संग बैठ के, एक और तस्वीर देखना
फिर तस्वीर के भीतर की तस्वीर देखना ,
एक दोस्त को ज़ूम पे देख ,उसके भीतर की तस्वीर देखना , आसान नहीं
बड़ा मुश्किल होता है -------

जब हम दोस्त दुबारा मिलेंगे , यकीनन
यह जमीन _आकाश तो वही होगा ,
पर एहसास कुछ डरा सेहमा सा होगा ,
अपने भीतर के डर से लड़ पाना ,
आसान नहीं।
बड़ा मुश्किल होता है -----

पुनः मिलेंगे वही लोग वही चेहरे
मिलेंगे अब अक्सर ,इनसे और उनसे
मगर खो गए हैं कुछ पहचाने हुए चेहरे, उन्हें भुला पाना आसान नहीं
बड़ा मुश्किल होता है -----

लौटेगा समय फिर ,इस अदब की फुलवारी में ( अदबी संगम )

उम्मीद है अब नहीं सामना होगा किसी अजीब बीमारी से
हंसेंगे हम सब मिलकर पुनर्मिलन के इस जश्न में
महकेंगे ,हँसेंगे गाएंगे हमेशा एक साथ ,जैसे खिलते है बागों में फूल,
वरना मुरझाये फूलों का खिलना, आसान नहीं
बड़ा मुश्किल होता है -----

जाम पे जाम ,महकती सांस में मधुमास होगा ,
उम्मीद है सबको अपना, वही पुराना एहसास होगा,
आपका हर दोस्त पास ,और मिलन भी खास होगा

ऐसे में जाम पे जाम पीकर ,बहकने को रोक पाना , आसान नहीं
बड़ा मुश्किल होता है ----------

समय की मार सह लेना ,नहीं रुकना मगर मेरे साथी
अंधेरी राह हो फिर भी ,नहीं रुकना तुम्हे मेरे साथी

राख के ढेर पे क्या शोला-बयानी करते हो
एक क़िस्से की भला कितनी कहानी करते हो , (दोस्त ने फिर टोका )

अच्छा चलो आगे बढ़ चलें , जश्ने गीतों के साथ

तीर्थ जैसे कोई पा लिया हो ,हमने पुनर्मिलन में
अब फिर से मिलगये कोरोना के बिछड़े यार
आप सब मिले हैं तो यादें भी लौट आएँगी
झिलमिलाने लगे है जेहन में दिन वही ,
हम थे , आप भी थे , और थे ,पेग भी चार

मिले फ़ुर्सत तो सुन लेना फिर किसी दिन
मिरा क़िस्सा भी निहायत मुख़्तसर सा है
मेरी रुस्वाई में ,आप सब हैं बराबर के शरीक,
आज वक्त को ऐसे ही गुजर जाने दो

अपने रोज के क़िस्से , यारों को सुनाता भी कैसे ?
निकाल दिया था उसने हमें , अपनी जिंदगी से यूँ -
भीगे कागज़ की तरह ,

न लिखने के काबिल छोड़ा न जलने के
सब को मिले हुए भी ,एक जमाना जो गुजर गया

क्या कहें, मगर ये क़िस्सा भी आज पुराना हुआ
नीयत जिनकी है साफ़ नही, वह क्या समझेंगे पूनर्मिलन की बातें ,

बगल में था मकान उनका ,फिर भी मिलने से डरा करते थे ?
किसी से भी ये छुपा नहीं, न मिलने के कैसे कैसे बहाने ,वो बना लिया करते थे

मायने जिन्दगी के, इक छोटी सी वजह , इस कदर बदल देते हैं
छलावे सपनों के, असूल बनावट के ,सब पीछे छूट जाते हैं ।

कल सब्जी ख़रीदने गया था , अचानक पुरानी मोहब्बत से पुनर्मिलन हो गया , मुझे देखते ही मुस्कराई और हेलो बोला फिर अपने बेटे से बोली " बेटे नमस्ते करो मामा हैं तुम्हारे ,
बेटा था ,मेरी तरह भोला सा , बोला ममी " इतने तो तुमने आलू नहीं खरीदे जितने मेरे मामा गिनवा दिए ? बड़ी ठेस लगी हमारे पुनर्मिलन को ,पर जिन्दा दिल थे सो सब सेह गए , हम तो आप सबके लिए भी ऐसी ही जिन्दा दिल्ली की दुआएं करते है

जिंदादिली इंसान की ,उम्र की मोहताज़ नहीं
नूर ये ज़िंदगी का है ,ताउम्र रहे यही दुआ है ।

पत्नी ने झकझोर के जगाया , क्या बड़बड़ाये जा रहे हो , कितनी देर से चाय रख के गई हूँ तुम्हारे सिरहाने ,ठंडी बर्फ हो गई है , उठो आज एक साल बाद तो तुम्हे अपने अदबी संगम के दोस्तों से भी मिलना है। क्या करू जानू रात बहुत पेंडिंग काम निबटाया , अदबी संगम का टॉपिक "पुनर्मिलन "भी लिखा , हाँ हाँ सुना जो अभी अभी बड़बड़ा रहे थे।

आज थकावट ही नहीं दूर हो रही , कुछ ऐसी जोशीली बात करो के मेरी नींद खुल जाए , ? जोशीली बात का तो मुझे पता नहीं क्या होती है , लेकिन यह जो रोज देर रात ऑफिस का काम कर रहे होते हो न ?
मुझे सब पता है देर रात किसी मर्लिन मोनरो से चैटिंग कर रहे थे न ? नहीं --तो - मैं मैं तो ऑफिस का काम , लेकिन तुम्हे यह सब किसने बताया ? मिस्टर जिस लड़की से आप रोज चैट करते हो न वह मेरी ही फेक प्रोफाइल है।
अब बोलो बाहर ताक झाँक चल रही है वर्क फ्रॉम होम के बहाने ?,
घर में कोरोना की वजह से सोशल डिस्टन्सिंग और बाहर तांकझांक ? घर में तो किसी से न मिलने के कई बहाने हैं तुम्हारे ? घर में पुनर मिलन कब होगा ?
यह सुन कसम से नींद ऐसी खुली के पूछो मत ------ यह तो गनीमत रही वह लड़की मेरी पत्नी ही निकली वरना भाई साहब मत पूछो क्या होता मेरे साथ। बड़ी मुश्किल से खुद को सँभालते हुए मुहं से यही निकला ----- यह तो बस युहीं मजाक मजाक में नींद भगाने के लिए चैटिंग कर लेता था, अब तो नींद पूरी तरह से भाग गई न ? चलो उठो घर के बहुत काम करने है तुम्हे।

तुम तो जानती हो मैं तुम से कितना प्यार करता हूँ ?, तो क्या मैं नहीं करती ? मैं तुम्हारे लिए सारी दुनिया से भी लड़ सकती हूँ , पर तुम तो सारा दिन मेरे साथ ही लड़ती रहती हो , तो क्या गलत करती हूँ ? तुम ही तो मेरी दुनिया हो जानू ,

अब इस प्यार के पुनर्मिलन का मेरे पास भी कोई जवाब नहीं
अब कहीं वह दूरियां खवाबो में भी डरा न सके हमको
नियति से अभिशप्त होती वासनायें भी ,
उठाओ जाम होटों से लगा लो , मेरा प्यार समझ के
इतना रंगीन कर दो इस पुनर्मिलन को, कोई भुल न सके

आओ मिलकर , दंश दिया है जिंदगी को जिसने ,
वह कहानी हम भुला दें
आपसी मनभेद की अंतर्व्यथा को,
हम हमेशा को सुला दें,
हो जाते है छोटे मोटे , मनमुटाव हमारे बीच कभी कभी ,

अब इस पड़ाव पर और नहीं -----------
बहुत भुगत चुके है ,जुदाई के वह लम्हे।
जिंदगी की कड़वी मीठी सचाई भी
धो के मैल दिलों का ,इस पुनर्मिलन से आओ ,
इक नई रीत चला ,खुशहाल खुद को बना ले ,













Tuesday, September 15, 2020

MAA KA KARZ---------- UNDERSTANDING YOUR MOTHER--------एक माँ का पत्र अपनी बेटी के नाम

          एक माँ का पत्र अपनी  बेटी के नाम 
                                           "LIFE BEGINS HERE AGAIN "



एक माँ का पत्र अपनी  बेटी के नाम 

मृत्यु शैया पर लेटी हुई ,

गंभीर बीमारी से पीड़ित एक 'माँ',

चिंतित है,

इस बात से नहीं, 'कि'
इलाज़ कैसे होगा?
'बल्कि'
इस बाते से,
'कि'
मेरे बाद,
मेरे बच्चो का क्या होगा.. !?

Letter from a Mother to a Daughter: 

"My dear girl, the day you see I’m getting old, 
I ask you to please be patient, but most of all, 
try to understand what I’m going through. 
If when we talk, I repeat the same thing a thousand times, 
don’t interrupt to say: “You said the same thing a minute ago”... Just listen, 

please. Try to remember the times when you were little and I would read the same story night after night until you would fall asleep.
 When I don’t want to take a bath, don’t be mad and don’t embarrass me.
 Remember when I had to run after you making excuses and trying to get you to take a shower when you were just a girl? 

When you see how ignorant I am when it comes to new technology, 
give me the time to learn and don’t look at me that way... remember, honey,
 I patiently taught you how to do many things like eating appropriately, getting dressed, combing your hair and dealing with life’s issues every day...

 the day you see I’m getting old, I ask you to please be patient, but most of all, try to understand what I’m going through. If I occasionally lose track of what we’re talking about, give me the time to remember, and if I can’t, don’t be nervous, impatient or arrogant. Just know in your heart that the most important thing for me is to be with you. 

And when my old, tired legs don’t let me move as quickly as before, give me your hand the same way that I offered mine to you when you first walked.
 When those days come, don’t feel sad... just be with me, and understand me while I get to the end of my life with love. 

I’ll cherish and thank you for the gift of time and joy we shared. With a big smile and the huge love I’ve always had for you, I just want to say, I love you... my darling daughter. "

Happy Mother's Day!

Mother stands for
M – For the MILLION things she gave me,
O – For shuttles growing OLD,
T – For the TEARS she shed to save me,
H – For her HEART of purest gold,
E – For her EYES, with love-light shining,
R – For she is always RIGHT and always be.
— with me 


Wednesday, August 26, 2020

ADAB SANGAM TOPIC --BARSAT ----- बारिश ---RAINS---- वर्षा -- मींह -- बरसात के पल -August 2020


"LIFE BEGINS HERE AGAIN 




बरसात या बारिश का हर जिंदगी पे ,
होता अलग अलग असर है ,
 मौत का फरमान है किसी का ,
किसी के जीवन की गुजर बसर है  

 शायर बरसात को  रोमांटिक बताता है -
 गीतकार बरसात पे गीत लिख देता है  ,
हम से  मिले तुम , तुम से मिले हम..  , बरसात में , 


किसान झूम झूम के गाता है बरसात मे
रब्बा रबा मींह बरसा साढे  कोठी दाने पा 
प्रेमी अपनी मेहबूबा मिलन की रात को याद करता है 
वाह ! क्या बरसात की रात थी वोह,

 जिंदगी भर नहीं भूलेगी वोह बरसात की रात 
, कीचड़ से सनी  सड़कों में मुलाकात की रात , 
कभी ना जुदा होने की कसमों की सौगात। 

प्यार की तपिश में बह जाने की बरसात की  रात ,
जेहन में उठते तुफानो को समझने की वोह रात 

गर बादलों से सजे आसमां को, 
था ग़ुरूर  सबसे ऊंचे होने का  ,

पूरी कायनात ,उसकी बूंदो की गुलाम,
 सब मेरी बूंदों  लिए ही तो तरसते है ?

बिन मेरे कैसे चलेगा इनका कोई भी काम 
इसी में ही तो निहित है,इन सबका मुक़ाम 


ऐसा था तो बारिश को मगर, ‘ज़मीं’ ही रास क्यों  आयी ?
सिर्फ इंसान ही क्यों कुछ तो चाहत रही होगी 

इस बरसात की बुंदों कि भी….. 
वरना कोन गिरता है जमीन पर ,
आसमान तक पहुँच जाने के बाद…?…


वक्त के साथ बरसात के मायने जरूर बदल गए है ,
किसे इलज़ाम  दे , फितरतन इंसान भी तो बदल गए है 

जो बरसात बचपन में हमें हर  सुकून  देती थी ,
आज वही बरसात की रात हमें अपने टूटे हुए

रिश्ते के दर्दों का , एहसास दिलाती सी लगती है !!
बरसात से रिश्ता आज भी उतना ही गहरा है,
हम जीने वालों का। 

तन मन को शांत करता आखिर ठंडा पानी ही तो है ,
 रिश्तों ने जख्मों पे गिराया जो ,वह  नमक तो नहीं ?

आँखों के सामने वह मंजर भी आज जीवित हो उठा  है 
जब उसने कुछ लिख ,फिर मछोड़ कागज के टुकड़े को,
 मेरी गाडी पे फेंका था , जिसमे यह पैगाम  लिखा था 

मेरे अजनबी दोस्त ,तुम्हे पहली बार उस बरसात में अपनी गाडी़ को ठीक करते देखा था,,
मैं सामने वाली बालकनी की टपरी से तुम्हे घंटो निहारती रही थी…तुम्हारी कश्मकश को 

मगर तुम  मशगूल थे शायद, ठीक करने में अपनी गाडी़
मेरी और …एक बार भी नजर, उठी नहीं तुम्हारी। .....
किस हक़ से देती आवाज तुम्हे ?कैसे शुरू होती हमारी बात ? 
  देख पाते तुम मुझे अगर ,दिख जाती मेरी  
आँखों में तैरती ,
उफनती ,लहराती झमाझम  प्यार की वह बरसात,
 

आज भी ढूंढ़ती रहती है ,आँखें मेरी कुछ मायूसी ,
और कुछ उमीदों से भरी ,हर उस बरसात की रात में,
 
शायद फिर कभी आपकी गाडी बरसात में बिगड़ जाए, 
जो बात अधूरी थी वो  शायद ,आज दीदारे यार हो जाय , 

कितने ही दिल जोड़े थे इस बरसात ने  ,मैंने सुना है मगर 
उन हसीं खवाबों का क्या, जो टूट गए इसी  बरसात में  ? 

अभी तक इसी इंतज़ार में हूँ , सोच में  रहती  हूँ 
कभी बेपनाह बरसी , कभी गुम सुम सी है ……
इस बारिश की फितरत भी कुछ-कुछ तुम सी है |

ऐसा रिश्‍ता भी क्या?, जो बारिश की तरह बरसकर खत्‍म हो जाए?
 रिश्‍ता हवा सा चाहिए ,जो खामोश भले हो ,मगर हो बसा हर सांस में 

❤हर बार यही दुआएं मांगती हूँ 
ए बारिश ज़रा थम थम के बरस,
 मेरा यार आ जाए तो जम के बरस लेना 

पहले इतना ना बरस की वो आ ना सके,
फिर इतना बरसना की  , वो जा न सके 
 वापिसी के रास्तों पे समुन्द्र सी बन जाना ,
जिसके पार, बड़े से बड़ा तैराक भी, जा न सके 

बरसात से भरे बादलों  ने एक जोरदार गर्जना की ,
पूरा आसमान जगमगा उठा , आवाज आई 
बारिशों से दोस्ती ,इतनी अच्छी भी  नहीं ,
कच्चा तेरा मकान है ,और  खतराये तुम्हारी  जान है 


 ऐसी शायरी  तब सूझती है जब हमारे पेट में रोटी और तन पे कपडा और सर पर छत सलामत हो ? यह सब हमे देने वाला कौन है अब जरा उसकी भी सुनते है ? 

एक बेचारा इंसान टकटकी लगाए ,
बैठा है टिकाकर निगाहें,आकाशकी और ' इंतज़ार है उसे बरसात का
बादल आये तो जरूर पर , बिन बरसे ही मुहं फेर चल दिए कहीं और

वह इंसान चीख उठा , रोता रहा बादलों की बेवफाई पर , बारिश की रुस्वाई पर ,
कैसे अदा होंगे कर्ज उसके , जो बीज उसने बोये थे , वह भी तो उधारी पर थे।
यह मजलूम इंसान एक किसान है , कभी बाढ़ कभी सूखा , बस यही उसका अंजाम है

बेटी की शादी भी तो करनी है , इसी फसल के भरोसे ? बड़बड़ा रहा था मन ही मन में 
बारिश की बूंदों को हुआ घमंड.है .
 बादल भी अब बदल गए है , गरीबों के गावं और खेतो को छोड़, 
अमीरों के शहर में ही रुक गए है 
यहाँ हमारे खेत  बरसात को तरसे …है …और यह शहरों में झमाझम बरसे है 

.!एक आवारा सा बादल , बिछड़ गया था अपने कारवां से
सुन किसान की पुकार रुक गया ठिठक कर , मजबूर था ,
इतना पानी न था उसके पास जो बुझा सके उसकी धरती की प्यास ,

वह ठहरा रहा कुछ पल , पीछे से आते बादलों के इंतज़ार में ,
सबने मिलकर इतनी गर्जना की , किसान की नींद खुली , 
छत से पानी जो टपका उसकी गाल पे। झूम उठा किसान ,
बेफिक्र हो अपने मकान की टपकती छावं से , नाचने लगा  

हो गई झमा झम बारिश. हमारे गांव और शहर मे एक साथ 
अब रोती हुई आँखो केआँसू भी ,
जा मिले बरसात के सैलाब में  

बारिश समझनी है तो किसानों के चेहरे पर पड़ी पेशानी ,
और उसके  बहते आसुओं की शायरी की नज्मो को  पढो..
वरना शायर ने तो फक्त  इसे इश्क के दायरे में ही बांध रखा है

कैसे  जान पे बन आई थी उस बेचारे किसान की। 
बादल भी किसान को खुश देख आगे बढ़ चले ,
किसान की जिंदगी बारिश के फंदे में झूलती रहती है ,
उसकी जिंदगी और मौत के बीच यही बरसात ही तो है ?

बहुत काम बाकी था उनके पास ,
बहुत बोझ भी तो  था बादलों में पानी का , 
उसे भी तो मंजिल तक पहुँचाना था 
 धरती , नदियों , पेड़ों  की धुलाई सफाई करना भी ,
प्रकृति ने उन्हें ही तो सौंपा था.

!अब बादलों का कारवां टहलते टहलते जा पहुंचा चमचमाते शहरों में ,
धुलाई शुरू हुई सड़को पे सैलाब आ गया।

इंसानो की बेशकीमती गाड़ियाँ , छोड़ के अपने मालिकों का साथ
चल पड़ी लहरों की मौजों के साथ , जैसे कह रही थी , ऊब गई हैं
इस शहर की आबो हवा से , नहीं करनी हमे अमीरों की नौकरी ,
अब तो जहाँ लहर वहीँ हमारा पीहर। 
जो कभी एक किसान की जिंदगी में बारिश का महत्व नहीं समझता था 
अब यह शहरी इंसान भी अपना जानो माल का नुकसान देख रोने लगा।

इन्शुरन्स वाले भी दिवालिए होकर अपने वादों से मुकरने लगे
क्या विधान है विधि का एक इंसान , रोता बारिश बिन , दूजा कोसे बारिश को

एक दूसरा सीन मेरे बचपन की बरसात का :मेरे मन में कौंधा --

बच्चों को कभी देखा था बरसात में खूब उछल कूद करते
बेफिक्री से इस बरसात का लुत्फ़ उठाते थे ,
 लेकिन अब वह बात नहीं होती 

बरसात का मौसम और बारिश कि बूंद, एक मौका होता था घर में रहने का 
पकोड़े और मालपुए , और गरमा गर्म चाय ,पूरा परिवार एक साथ , 
बड़ा सुखद संयोग हुआ करता था , आज यह खाओ वो न खाओ की नसीहत ,
 बरसात के लुत्फ़ को ही फीका किये जाते है 
,

चांद को मामा और तारों को अपने बिछड़े दोस्त बताए अब वो रात ही नहीं होती ,
पेड़ों पे लगे सावन के झूलों से खिलखिलाती सखियों कि बात नहीं होती ,
छत पे रात को बारिश सोते को  जगाया करती थी , अब छत पे वोह खाट नहीं होती 
शहर शहर गाँव गांव बहुत तलाशा बचपन को, कैसे मिलता इतने वक्त के बाद ?
आईने में देखा तो यकीन आया , यह तो  कब का बुढ़ापे में उत्तर आया था , 

याद आने लगी हमें वह अमीरी जब हमारे पास वक्त की दौलत खूब  हुआ करती थी 
जितनी भी खर्च करो ख़त्म ही नहीं होती थी , हर काम हर बात के लिए वक्त ही वक्त था 
बरसात ही हमारा एकमात्र मस्ती का जश्न होता था , 

अचानक कहाँ खो गई हमारी वह अमीरी ?, 
 

हर बारिश के तूफान  में हमारे कागज के जहाज चला करते थे
उन सुखद पलों की फक्त यादें ही बची है अब तो 
बाकी सब कुछ तो कभी का गृहस्थी के सैलाब में बह गया  
वक्त की कमी ने हमे गरीब बना दिया ,और तब से 

हमने  वैसी बरसात नहीं देखीं!
वैसे तो आजकल मेरे शहर में भी बरसात बहुत हो रही हैं, लोग बड़े खुश है
पर इन्ही बूंदो के शोर में मेरा रोना किसी को सुनाई नहीं पड़ता!तूफानी बारिश नै कितने ही घरों की छतें उड़ा दी , गरीब की झोपडी की तो औकात ही क्या थी ?


बात चली किसान की तो , सड़क किनारे बने गरीबों के झोपड़ों का बह जाना 
बरसात में कई तरह के मछर मखीओं का बेइंतेहाः बढ़ जाना 
घर में बिमारियों का बढ़ जाना ,यह भी तो बरसात की ही देंन होती है, 
ख़ुशी के साथ साथ  बरसात मुसीबत भी तो लाती है   


बारिश और तूफ़ान’में एक पंछी का रुद्रण भी सुनाई देता है
वो परिंदा हिज्र में रात भर उसी टूटी टहनी पर बैठकर रोया,
जिस टहनी पर उस शाम तक उसका घर हुआ करता था, 
आज वोह वृक्ष बेदाम सा जमीन पे पड़ा है , 
बारिश ने उसे इतना पानी पिला पिला कर पानी के नशे मे सराबोर हुई 
उसकी जड़ो को जमीन से ही जुदा कर दिया था , 


जब  बरसात के साथ हवा का तूफान भी चलता है ,
तब कहाँ उसपे किसी का जोर चलता है 
उखड़ गए पेड़ भी आकर  उसकी चपेट में ,
बुढ़ापे की देहलीज़ परथे , गिरे जो सहारे की तलाश में  ,
किसी मकान या दुकान या सड़क पर खड़ी  कार पे।  
आप रोये अपने नुकसान पे , और पेड़ चले शमशान को। 


आँधियों ने एक झटके में उनका  वज़ूद ही मिटा दिया,
 लेकिन गिरते गिरते, कई मकान और कीमती गाड़ियों को भी जन्नत रसीद  करा दी ,
 लोगो को चेता दिया की हम तो मरेंगे सनम तुम्हे भी ले डूबेंगे ,तुमने प्रकृति से जो खिलवाड़ किया है , मेरी जड़ो को भी जो अपने मतलब के लिए कंक्रीट के फुटपाथों में दबा कर  मुझे जीते जी ही दफना दिया था , 

मैं वहां १०० साल से खुली साँसे लेता था इंसान को भी सांस देता था ,मैं आंधी तुफानो के वेग को कम कर तुम्हारी जान माल की हिफाज़त करता था  
मुझे इसी  बारिशकी सौगात ने जमींदोज़ करके मुझे मोक्ष दिला कर 
तुम्हारी कैद से आज़ाद कर  दिया है 
लेकिन हे स्वार्थी  इंसान अब आप किसका सहारा ढूंढोगे ? यह बरसात तुम्हे भी नहीं  छोड़ेगी , चुन चुन कर तुम्हारा भी हिसाब करेगी। यह एक गिरते हुए पेड़ का अभिशाप पूरी दुनिया में बरसात का तांडव मचाये हुए है। सब कुछ बहे जा रहा है इसके प्रकोप से। 


ये बारिश का पानी आशिकों को अच्छा लगता होगा
हमें तो जुकाम हो जाता है.. भीग जाने पर 
बारीश जरुरी हैं खेतो में ये सोच कर सहम जाता हूँ ,
वरना टपकती छत में नींद 
किसान  को भी कहाँ आती? जनाब ?